शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

।। स्वप्न कैनवास ।।

मेरे पास
तुम्हारे शब्द हैं
और तुम्हारे पास
मेरा मौन ।

तुम्हारे पास
मेरे अधीर शब्द हैं
मेरे पास
तुम्हारा इच्छित संसार ।

स्वप्न-कैनवास में
यथार्थ के चटख, शोख और सरस रंग
जिन्हें देती हूँ शब्द-नाम
अविस्मरणीय - तुम्हारी ही तरह ।

स्मृतियों में बसे रहते हैं
अकेलेपन के विश्वसनीय सहचर
कभी तुम्हारे शब्द
कभी आत्मीय - आत्मज शब्द ।

सविता-रश्मियों की
सुनहरी अंजलि में
रखती हूँ स्नेह-चितवन के समर्पण का
अक्षय चुम्बन ।

परदेशी हवाओं में
घुलाती हूँ प्रणयगंधी स्वप्न-श्वास
और अपरिचित दुनिया को
बनाती हूँ - आत्मीय

जैसे बच्चे बनाते हैं
रेत में घरौंदा
जीवन-यथार्थ में जीते हैं -
स्वप्न खेल । 

तुम्हारे भावाकाश में
रोपती हूँ अपने आकांक्षा बीज
सृजन की आहट अगोरती धड़कनें 
रचना चाहती हैं - स्नेह तरंगित ध्वनियाँ ।

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