मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

।। प्रतीक्षा के स्वप्न-बीज ।।





















प्रतीक्षा में बोए हैं स्वप्न-बीज

उड़ते सेमल के फाहों को
समेटा है मुट्ठी में
विरोधी हवाओं के बीच ।

आँसू ने धोई है -
मन की चौखट
और प्राणवायु ने
सुखाई है - आँखों की जमीन ।

अधरों ने
शब्दों से बनाई है अल्पना
और धड़कनों ने
प्रतीक्षा की लय में
गाए हैं - बिल्कुल नए गीत ।

प्रतीक्षा में होती है
आगमन की आहटें
पाँवों की परछाईं
हथेलियों की गुहारती पुकार
आँखों के आले में
प्रिय के आने का उजाला समाने लगता है
और एक सूर्य-लोक दमक उठता है ।

प्रतीक्षा के सन्नाटे में
कौंधती है आगमन-अनुगूँज
शून्यता में तिर आती हैं
पिघली हुई तरल आत्मीयता की लहरें ।

समाने लगता है
अपने भीतर अमिट संसार
आँखों में ...साँसों में
पसीज आई हथेली में ।

आँखों की पृथ्वी पर
होती हैं भाव-ऋतुएँ
नक्षत्र से निखरते हैं
तुम्हारे नयन निष्पलक

चुपचाप परखती हैं आँखें
अलौकिक प्रभालोक
तुम्हारे प्रणय का
अक्षय आकांक्षा-वलय ।  

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