बुधवार, 10 जुलाई 2013

।। वियोग-सुख ।।


















तुमसे
छुपाकर जीती हूँ
तुम्हारा वियोग ।

आवाज में ही
दवा ले जाती हूँ रूलाई ।
लिखने से पहले
शब्दों से खींच लेती हूँ
बिछोह की पीड़ा ।

तुम तक
पहुँचने वाले
सूर्य और चन्द्र में
चमकने देती हूँ
तुम्हारा चूमा हुआ प्रेम ।

वियोग-संताप को
घोलती हूँ रक्त भीतर
कि आँख में जन्म न ले सकें आँसू ।

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