रविवार, 7 जुलाई 2013

।। चुपचाप ।।


















आँखों के भीतर
आंसुओं की नदी है ।
पलकें मूँदकर
नहाती हैं आँखें ।
अपने ही आँसुओं की नदी में
दुनिया से थककर ।

ओठों के अंदर
उपवन है,
जीते हैं ओठ ।
चुप होकर स्मृति
प्यास से जलकर
एकाकीपन की आग में ।

ह्रदय की वसुधा में
प्रणय का निर्झर नियाग्रा है
मेरे लिए ही झरता हुआ ...।

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