सोमवार, 8 जुलाई 2013

।। व्याकुलता के विरुद्ध ।।


















मेरी घड़ी में
जागता है तुम्हारा समय
मेरी साँसों में
तुम्हारी साँसें ।

अपनी आँखों को
जोड़ दिया है तुम्हारी आँखों से
जी जुड़ाने के लिए ।

तुम्हारी महक को
बचा लाई हूँ सामानों में 
कि वे स्वप्न बन गए
और कमरे में तुम्हारी पहचान की सुगंध
अकेलेपन की घुटन के विरुद्ध है ।

तुम्हारे सामान मेरे सामानों को
अपनी पहचान दे रहे हैं,
तुम्हारी हथेली की तरह ।

मेरा प्रेम
धरती के अनोखे
पुष्प-वृक्ष की तरह
खिला है तुम्हारे भीतर

आँखें
अपना चेहरा
देखना चाहती हैं
तुम्हारी आँखों के प्यार में ।

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