बुधवार, 17 जुलाई 2013

।। ईश्वरानन्द ।।

















मैं
तुम्हारे प्रेम का धान्य हूँ
और तुम
ह्रदय का विश्वास ।

तुम्हारी स्मृति-कुठले में
संचित उपजाए अन्न की तरह हूँ ।

अपनी अन्तःसलिला में
रूपवान मछली की तरह
तैरने देना चाहते हो मुझे ।

तुम
जीना चाहते हो मुझमें
प्रेम का सौन्दर्य
और मैं
पीना चाहती हूँ
सौन्दर्य-सुख ।

जीवन का विलक्षण आनन्द-प्रेम
'धर्म' के लिए 'ईश्वरानन्द' है जो ।

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