मंगलवार, 9 जुलाई 2013

।। तुम्हारे शब्द ।।

























घर में तुम
घर की तरह बचे हो
मुझमें मेरी तरह ।

मेरे मौन में
समाई है तुम्हारी ख़ामोशी
जैसे मेरे शब्दों में
तुम्हारे शब्द ।

तुम्हारी कंघी को
फिर लेती हूँ अपने केशों में
तुम्हारी सहलाती
हथेली हैं वे

तुम्हारी अनुपस्थिति को
भरती हूँ तुम्हारी ही सुगंध से
तुम तक पहुँचने के लिए
घनेरी रात में ।

तुम्हारी छोड़ी हुई
हर चीज को
छूती हूँ
कि जैसे अपने
स्पर्श में से
बचे हो तुम
हर वस्तु में ।

तुम्हारे देखे गए दर्पण में
आदमकद देखती हूँ खुद को
लेकिन तुम्हें ही
पुनर्प्राणार्जित
मेरी साँसों में
चलती हैं तुम्हारी साँसें !
जैसे तुम्हारे जीवन में
मेरा जीवन ।

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