सोमवार, 15 जुलाई 2013

।। योग साधना ।।



















प्यार की
पहली सिहरन में
मुँदी पलकों के भीतर
जगी आँखों ने जाना
देह-भीतर
देह का जादू ।

खामोश शब्दों ने किलक कर
जन्म लिया
नवानुभूति से भरकर ।

अनुभूति की उड़ान-सुख में
अनुभव किया
अपनी ही देह का अमृतस्राव
प्रिय अधर में ।

चाँद निहारने वाली आँखों ने
जाना चाँद का सुख
जो साधना के योग से मिलता है
भोग की साधना से नहीं ।

तुम्हारे स्पर्श ने
पिलाया है प्यार का अमृत
अपने स्पर्श में
भर लेना चाहती हूँ तुम्हारे अंतरंग का रोम-रोम ।

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