रविवार, 15 सितंबर 2013

।। मधुबन के लिए ।।


















बच्चे
अपने खिलौनों में
छोड़ जाते हैं अपना खेलना
निश्छल शैशव
कि खिलौने
जीवंत और जानदार
लगते हैं बच्चों की तरह ।

बच्चों के
अर्थहीन बोलों में होता है
जीवन का अर्थ
ध्वनि-शोर में रचते हैं
जीवन का भाष्य
जिसे रचती है आत्मा ।

बच्चों की
गतिहीन गति में होती है
सब कुछ छू लेने की आतुरता
उनके तलवों से
धरती पर छूट जाती है
उनके आवेग की गति
कि उनके सामने न होने पर भी
ये चलते हुए लिपट जाते हैं
यहाँ-वहाँ से ।

बच्चों के पास
होती है अपनी एक विशेष ऋतु
जिसमें वे खिलते हैं, खेलते हैं
और फलते हैं
हम सबके मधुबन के लिए ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें