सोमवार, 23 सितंबर 2013

।। दस्तक ।।


















दरवाज़े
बने होते हैं
दस्तकों के लिए ।

दस्तक से
तड़प उठते हैं
किवाड़ के रोम-रोम ।

दरवाज़े
सुनना जानते हैं दस्तक
पर चुप रहते हैं
गरीब के सपनों की तरह ।

दरवाज़े
जानते हैं
दस्तकों की भाषा ।

सुनवाई
न होने पर
दरवाज़े छोड़ देते हैं दीवारें
और दीवारों के घर ।

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