सोमवार, 9 सितंबर 2013

।। बीज ।।


















औरत सहती रहती है
और चुप रहती है
जैसे रात ।

औरत सुलगती रहती है
और शांत रहती है
जैसे चिंगारी ।

औरत बढ़ती रहती है
सीमाओं में जीती रहती है
जैसे नदी ।

औरत फूलती-फलती है
पर सदा भूखी रहती है
जैसे वृक्ष ।

औरत झरती और बरसती रहती है
और सदैव प्यासी रहती है
जैसे बादल ।

औरत बनाती है घर
पर हमेशा रहती है बेघर
जैसे पक्षी ।

औरत बुलंद आवाज़ है
पर चुप रहती है
जैसे शब्द ।

औरत जन्मती है आदमी
पर गुलाम रहती है सदा
जैसे बीज ।

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