मंगलवार, 12 जुलाई 2016

।। दुनिया का सच ।।

आँखों में बैठी-बैठी
दृष्टि की उँगलियाँ
स्पर्श करती हैं
यूरोप की जादुई दुनिया
जिसमें शामिल है  आदमी
औरत
और उनका प्रेम भी ।

दृष्टि उँगलियाँ
रहती हैं अपनी आँखों की मुट्ठी-भीतर
बहुत चुपचाप
वह कुछ नहीं पकड़ना-समेटना चाहती हैं

मन
संगमरमर की तरह 
पत्थरा गया है   चिकनाकर
जिस पर
कोई मन नहीं ठहर पाता है
खेल खेलने के नाम पर भी ।

मुस्कुराना
ओठों का व्यायाम भर
हो सकता है
हृदय की मुस्कुराहट नहीं

आँसू बहने के बाद नहीं सूखते
सूखे आँसू ही बहते हैं
और गीला दुःख
भीतर ही भीतर चुपचाप
सब कुछ गलाता रहता है ।

चेहरे की मुस्कुराहट
आधुनिक सभ्यता की
प्लास्टिक सर्जरी की तरह
भीतर का कुछ
बाहर नहीं आने देती है

देह भर बची है
मानव के पहचान की
भीतर से ख़ुद को
नहीं पहचान पा रहा है कोई

लोग सिर्फ़
डॉलर और यूरो पहचानते हैं
और उसके आसपास की दुनिया
किसी भी संबंध से पहले
और
किसी भी संबंध के बाद । 

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

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