मंगलवार, 19 जुलाई 2016

।। रचने के मोह में ।।

पृथ्वी के लोगों ने ही
रचा है
समय का गुंजलक
पृथ्वी पर
और उसी में
फँसे हैं   वे

इतिहास रचने के मोह में
कर रहे हैं युद्ध
जता रहे हैं अपनी अपनी शक्ति
आतंक के शिकंजे से

धर्म में उलझाए हैं  राजनीति
राजनीति में घुसाए हैं  धर्म

समय के साँचे-भीतर
बनता है सभी का चेहरा
समयानुसार
कुछ समय के लिए

अतीत को
शनैः शनैः छाँटता है  समय
शब्दों के गर्भ में
बचती है  सिर्फ संस्कृति

बच्चों के सुख में
जन्म लेते हैं  उनके अपने सपने
बसे-बसाए हैं  जिसमें
संपूर्ण विश्व-स्वप्न

बच्चे
अपने खिलौनों की तरह ही
जीना चाहते हैं
भरी-पूरी रंगीन और गतिशील  जादुई दुनिया

फुटबॉल खेलने के आनंद-सा
जीना चाहते हैं  दुनिया का आनंद

वह ख़ुश रहते हैं
और ख़ुश रहना चाहते हैं

दुनिया से होती है शिकायत
जब लोग नाराज करते हैं  उन्हें
और खींच लाना चाहते हैं
उनकी दुनिया से उन्हें   बग़ैर इच्छा के
जिस दुनिया से अभी हैं वे
बेख़बर ।

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

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