सोमवार, 18 जुलाई 2016

।। बच्चों के खेल ।।















 बच्चे
देखे गए सपनों से
निकालते हैं   नए सपने
जैसे
उसी कपड़े से निकालते हैं   धागा
फटे के रफू के लिए ।

बच्चे
मोर पंख में
देखते हैं   मोर
और पिता में परमपिता ।

पिता ही परमेश्वर
और माँ सर्वस्व ।

काग़ज़ की
हवाई जहाज की फूँक उड़ान में
उड़ते देखते हैं   अपने स्वप्नों का जहाज ।
रेत के घरौंदे में
देखते हैं   अपना पूरा घर ।

वे
खेल खेल में
खेलते हैं  जीवन
और
हम सब
जीवन में खेलते हैं   खेल ।

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें