शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

।। नदीन का चाँद ।।

सूर्यास्ती सुनहरी साँझ की गोद में
खेलती ढाई साल की
रुपहले बालों और नीली आँखों वाली
गुलाबी बच्ची
किलककर
अपने पिता की छाती से हिलगकर
उनकी आँखों में आँखें डाल पूछती है
चाँद कहाँ है ? (वारीस द मान)
जैसे  ढूँढ आई हो
अपने पूरे घर-भीतर
घर से बाहर की झाड़ी-बीच
झाँक आई हो कई बार
घर के स्वीमिंग पूल में भी
डूबे चाँद को निकालने की
की होगी जैसे पुरजोर कोशिश ।

ढाई बरस की डच-भाषी बच्ची की
यादों की रगो में बसा है चाँद
जैसे  पूर्वजन्म में चंद्रलोक की परी थी कोई
चाँद उसका घर हो आज भी
सारे रिश्तों के बावजूद
चाँद से रिश्ता है अटूट
चाँद उसका दोस्त
उसे खिलाता है  अपने आकाश की गोद में
और स्वयं खिलखिलाता है  उसको अपनी आँखों में समेट
चाँदनी की तरह

दुनिया भर के बच्चों की आँखें
लगी हैं  टीवी या कंप्यूटर स्क्रीन के
छलावी खेलों की चकाचौंधी दौड़ में
अपनी स्मृतियों के सिंहासन में
बैठाया है  चाँद को अपने मनकुमार की तरह ।
याद आती है
अपने बचपन की लोरी
नानी अपनी थपकियों से गाकर
सुलाती थी
कि उनके कंठ में
चाँद सो जाता था
पर थपकियों की
गूँज में होती थी
चाँद के लिए भी लोरी
'माँ' के चंद्र-बिंदु के आकार में
नॉर्थ-सी के तट से नहीं दिखता चाँद
और न ही हँसिया के आकार का
संस्कृत के भाषाविद् तब कैसे देते नाम
चंद्राकार बिंदु का
अगर होते निवासी नॉर्थ-सी के ऊपरी कोने से किसी तट पर

याद आती है
'चाँद का मुँह टेढ़ा है'
मुक्तिबोध की कविता
यह सोचकर कि
जब जानेंगी नदीन होपा
चाँद के टेढ़े मुँह का मर्म
उसकी नीली आँखों की
ख़ुशनुमा यादों की झील में
कैसे झिलमिलाएगा 'चाँद'
आतंक और बम की आग को
जब जानेगी आँखें
तो कैसे याद करेंगी 'चाँद' को ।

चाँद को खोजती-पुकारती बच्ची के
शब्दों के आकाश में
मैं देखती हूँ चाँद
उसकी आँखों के आकाश में
उगता है चाँद   आकाश में उमगने से पहले
उसकी मुट्ठी में
खेलता है चाँद
उसकी हँसी में
घुल जाता है चाँद
उसके मन के आनंद के लिए
जिसमें सारे रहस्यमय खिलौने भी
छोटे पड़ जाते हैं
उसके अपने चाँद के सामने

नन्हीं बच्ची का चाँद
हम सबके चाँद से अलग है
अपना चाँद देखकर भी
नहीं देख पाते हैं  हम ख़ुद को
उसके पापा  ... माँ देखते हैं
उसमें अपना चाँद
वह अपने परिवार के आकाश का चाँद है
लेकिन
नदीन का 'चाँद'
आज भी आकाश में है
जिसे वह कभी नहीं भूलती है ।

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

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