मंगलवार, 2 अगस्त 2016

।। 'धी' हो तुम ।।

कवि ने
लख लिया है    तुम्हें
जैसे  अलख निरंजन को
लखता है   वह

कवि ने
ध्वनि विस्फोट में तुम्हारे
सुन लिया है तुम्हें   जैसे
बादलों की भीतरिया
मेघदूती अनुगूँज हो तुम !

तुम्हारी आवाज़
खिले हुए फूल की तरह है
प्रस्फुटित
और सुवासित

भाषा की
मात्र दुभाषिया ही नहीं
वरण
भाष्यशिल्पी हो
खजुराहो के शिल्पियों की तरह
हिंदी काव्यभाषा का
करती हो    सहज देहांतरण
रूसी भाषा में

निजभाषा की
प्राणरक्षक 'माँ' होकर
गाँठती हो   रिश्ता
सांस्कृतिक भाषा परिवार से
अन्य भाषाओं के
सृजन की सर्जक
संवेदनाओं के रूपांतरण में प्रवीण

अपनी मेधा से
पिलाती हुई   शब्दों को अर्थ

सुनते हुए
देखती हो
पढ़ते हुए
समझती हो
अपने मौन में भी
बोलती हो
सच्चे अर्थों में
'धी' हो तुम
अनास्तासिया गुरिया

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