शनिवार, 13 अगस्त 2016

।। साल्विनी ।।

माँ के सौंदर्य रस ने रची है
देह सरस
कि जैसे
नैसर्गिक सौंदर्य ने धारण की है देह
पुनः जीने के लिए

हृदय ने खोली है अपनी आँखें
तुम्हारी आँखों में
अधरों ने किया है धारण
संवेदनाओं का स्पंदन

सौंदर्य ने लिया है चित्रलिखित
अपरूप रूप
कि सौंदर्य-बूँद ने रची है
संपूर्ण देह

कि चंचलता भी लरजती है तुममें
तुमसे संभलकर
प्रेम भी उझकता है   दबे पाँव
चेहरे पर

जीवन की तरंगे भी सहेजती हैं तुम्हें
तुममें ही
सौंदर्य को साधने के लिए
कृत्रिम और आधुनिक हो चुके समय से
बचाने के लिए
कभी तुम्हारी 'माँ' की तरह
कभी तुम्हारे 'पिता' की तरह

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

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