शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

।। प्रकाश पर्व ।।

अँधेरे आकाश के
स्तब्ध कैनवास पर
बनाया जाता है
प्रकाश पर्व का अविस्मरणीय उत्सव
बच्चों की नन्हीं हथेलियों से तैयार
पटाख़ों के जख़ीरे से

सितारों सज्जित अंतरिक्षी छाती पर
धरती से छूटते हैं ... बेधते हैं
चकाचौंधी पटाख़े
नभ में बनाते हैं   रोशनी की अल्पना

रंगीन रोशनी छिटकती है
पाँखुरी की तरह
पर पटाख़े गूँजते हैं    चीख बन कर

आकाशी आँखों में
पटाख़ी रंगी रोशनी
रचती है
प्रकाश का आनंद-सुख

पटाख़ों का
उठता हुआ उजला शोर
धरती पर खींच लाना चाहता है
स्वर्ग का सुख ...
धरती का हर्ष ...
दीपावली पर्व पर

लेकिन
कब से और क्यों
सभ्यता ने रच दी
अभिव्यक्ति के लिए
पटाख़ों की भाषा ?
ख़ुशी की ध्वनि के लिए
रंगीन बमों के शब्द
जो युद्ध और विध्वंस की भाषा है

शत्रुता की कहानी के लिए
तोप और बंदूक़ों की शब्दावली
मिसाइल का आक्रमण
चोरी छुपे गोलाबारी
विश्व और खाड़ी-युद्धी
इराक़ी, ईरानी, लिबीयाई, सीरियाई और पाकिस्तानी
धरती के विध्वंसक शोर का हदस जगाऊ
ऐतिहासिक इतिहास जिसमें बंद

क्या शब्द-यात्री मनीषियों की
हज़ारों वर्षों की
पीढ़ी-दर-पीढ़ी की
कई भाषाओं का शब्द-पोषण
अधूरा है

प्रेमानुभूति के लिए शराब 
सुखानंद के लिए झिलमिलाती रोशनी
नफ़रत और आनंद के लिए
विध्वंसघोषी बम समानार्थक
युद्धवंशक ध्वनियाँ
बन गईं हैं   हर्ष भाषा
सभ्यता का
यह कैसा फ़लसफ़ा है ?

दीपावली और नए वर्ष के
हर्ष-प्रदर्शन में
ख़ून की कमाई को
तब्दील करते हैं
बारूदी रोशनी में
और धमाके के शोर से
सुनाई देती है    विध्वंस की गूँज
कई जीवन की साँसें
और कई सपनों की बुझी हुई
स्याह राख हो जैसे वह

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

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