रविवार, 21 अगस्त 2016

।। अपने ही अंदर ।।

आदमी के भीतर
होती है    एक औरत
और
औरत के भीतर
होता है    एक आदमी ।

आदमी अपनी ज़िंदगी में
जीता है    कई औरतें
और
औरत ज़िंदगी भर
जीती है    अपने भीतर का आदमी ।

औरत
अपने पाँव में चलती है
अपने भीतरी आदमी की चाल
बहुत चुपचाप ।

आदमी अपने भीतर की औरत को
जीता है    दूसरी औरतों में
और
औरत जीती है
अपने भीतर के आदमी को
अपने ही अंदर ।

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

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