सोमवार, 8 अगस्त 2016

डॉक्टर रेवती रमण के मूल्यांकन के अनुसार पुष्पिता अवस्थी का 'भोजपत्र' शकुंतला का कमल-पत्र है

पुष्पिता अवस्थी ने पिछले दिनों ही प्रकाशित अपना एक कविता संग्रह 'भोजपत्र'
वरिष्ठ कवि शमशेर बहादुर सिंह की स्मृति को समर्पित किया है ।
समर्पण-संदेश में उन्होंने शमशेर को 
'प्रेम की अंतर्पर्तों के चितेरे' 
के रूप में रेखांकित किया है ।
अंतिका प्रकाशन द्धारा प्रकाशित 'भोजपत्र' के
समर्पण-संदेश में पुष्पिता ने अपनी एक कविता की
कुछेक पंक्तियों को भी प्रस्तुत किया है, जो इस प्रकार हैं :
'प्रणय-देह के भोजपत्र हैं
  मन
  मानस
   आत्मा
    देह
सृष्टि और ब्रह्मांड
समाया है इनमें प्रेम और प्रेम में समाये हैं ये'


'भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह में 174 पृष्ठों में पुष्पिता की 127 कविताएँ 
प्रकाशित हैं । दस पृष्ठों में डॉक्टर रेवती रमण ने इन कविताओं का 
वस्तुपरक मूल्यांकन किया है । संकलन का आवरण चित्र 
शशिकला देवी की रचना है । फ्लैप पर डॉक्टर रेवती रमण के
'अनुभूति का रजकण ही प्रणय है' शीर्षक मूल्यांकन आलेख का
एक महत्त्वपूर्ण अंश है, जो इस प्रकार है :
'भोजपत्र' की अधिसंख्य कविताएँ प्रेम करने और पाने की प्रक्रिया से उपलब्ध आनंद का इजहार है । कवयित्री अपने पाठकों को आश्वस्त कर पाती हैं कि जो लिखा है, महसूस करके लिखा है । प्रेम घटित हुआ है तो अनुभूति विलक्षण हुई है । औरों को भी होती होगी, पर उनके वश में भाषा नहीं होती । सच तो यह भी है कि एक स्त्री चाहे जिस सामाजिक संस्तर की हो, पुरुष की हक़ीक़त जानती है; जबकि एक पुरुष के लिए सभ्यता के आरंभ से ही वह रहस्य बनी रही है । भारतीयता के विशेष संदर्भ में उसका सौंदर्य लाज भरा सौंदर्य रहा है । कई बार तो उसका शील ही सौंदर्य होता है । प्रसंग यहाँ प्रणय का है - प्रेम, स्नेह, प्यार, प्रीत उसके भिन्न नाम हैं । पुष्पिता की कविता प्रेम-धुन है, प्रणय-मणि है । उसकी लिपि 'हृदय लिपि' है, पर विचार बुद्धि से रहित नहीं । यह बुद्धि-वैभव से संपन्न स्त्री के चैतन्य का उल्लास है । इसमें हद बेहद का भाव-भेद निराकार हुआ है । बल्कि, कहना चाहिए कि पुष्पिता जीवन और जिजीविषा के लिए कोई हद मानती ही नहीं हैं । सच्ची और संपूर्ण प्रेमानुभूति आदमी को जैसे सूफी बना देती है, पुष्पिता प्रेम को 'बेगमपुरा' की अवधारणा में ढाल देती हैं । प्रेम में हर तरह का अभाव स्व-भाव बन गया है । प्रेमानुभूति का ऐसा प्रशस्त प्रांगण उन्होंने अपने अनुसंधान और यायावरी से संभव किया है । संप्रति, मैं ऐसी दूसरी कवयित्री को नहीं जानता जो इतने सरल, सहज ढंग से काया और मन को उजागर कर सके । अभिव्यक्ति में कहीं स्थूल का समावेश नहीं । उन्होंने जातीय कविता के गहन अध्ययन से बिंबों और प्रतीकों के प्रयोग में महारत हासिल की है । कोई चाहे तो मीरा, महादेवी, आन्दाल और ललद्यद को प्रसंगवश, याद कर सकता है । पुष्पिता का 'भोजपत्र' शकुंतला का कमल-पत्र है । उसमें वही कोमलता और दीप्ति है जो कालिदास का वाग्वैभव है । लेकिन इन कविताओं को पढ़ते हुए हमें चण्डीदास याद आते हैं, जयदेव और विद्यापति भी ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें