सोमवार, 1 सितंबर 2014

।। आत्मा की अंजुलि में ।।


















आत्मा की
अंजुलि में
तुम्हारी स्मृतियों की
परछाईं है
जो घुलती है
आत्मा की आँखों में
और आँसू बनकर
ठहर जाती है
कभी आँखों के बाहर
कभी आँखों के भीतर

तुम्हारी आत्मा के
अधरों में धरा है प्रणयामृत

शब्द बनकर
कभी होंठों के बाहर
कभी होंठों के भीतर

तुम्हें लखते हुए
आँखें खींचती हैं तुम्हें
सघनतम प्राण-ऊर्जा से
आँखों के भीतर
कि तुम्हारी अनुपस्थिति के क्षण को
जी सके एकाकी आत्मा
जैसे चाँद सारी रात
उजलता हुआ भटकता है
बस भटकता है सारी रात

दिन के उजाले में
खोकर भी खोजता है
तुम्हें और तुम्हारा बजूद

चाँद के साथ
तारों-सितारों की
घनी बस्ती है 

सप्तर्षि से लेकर
ध्रुव तारा तक
आकाश-गंगा
और मंगल-ग्रह तक
पर चाँद के लिए
कोई प्रणय गंगा नहीं
कोई सहचर-सरिता नहीं

चाँद ऐसे में
जनता है अपने ही अस्तित्व में
अपनी ज्योत्स्ना
अपने लिए अपनी चाँदनी
चाँद उसमें खोता है
और चाँदनी उसमें

कहीं ऐसे ही
तुम मुझमें
और
मैं तुममें तो नहीं ।

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