मंगलवार, 9 सितंबर 2014

।। एक ऋतुराज के लिए ।।

























तुम्हारी आँखें
लिखती हैं चिट्ठी
आँखों के कागज पर
पढ़वाती हूँ जिसे हवाओं से
और तुम्हारी साँस-सुख खींच लेती हूँ वृक्षों से
और तुम्हारे अस्तित्व में विलीन हो लेती हूँ सूर्य से
और तुम्हारा प्रणय-ताप रक्त में जी लेती हूँ मेघों से
और तुम्हारे विश्वासालिंगन में सिमट जाती हूँ

तुम्हारी छवि-परछाईं के
रन्ध्र-रन्ध्र के दर्पण में
उतर जाती हैं पुतलियाँ
सारी रात
बिनती और सहेजती हैं
चुए महुए-सा जिसे

तुम्हारी आँखें
लिखती हैं पाती
मन के दोनों पृष्ठों पर
जैसे हवाएँ
एक साथ लिखती हैं
वसुधा और गनन के मन भीतर
नम पाती
जिसे ऋतुएँ बाँचती हैं हर बार
एक ऋतुराज के लिए

हवाओं में
घोलती हूँ साँसें
और साँसें लिखती हैं
तुम्हारे नाम चिट्ठी हवाओं में
और तुम्हें खोजती हैं दसों दिशाओं में

धूप में
बढ़ाती हूँ अपनी
आत्मा की अग्निगर्भी दीप्ति
तुम तक पहुँचाती हूँ तुम्हारे लिए
अक्षय प्रणय प्रकाश
तुम्हारे मन की खिड़की से जो
पहुँचता होगा तुम्हारे निकट से निकटतर
कि नैकट्य की
नूतन परिभाषाएँ रचती होगी
तुम्हारी अतृप्त आत्मा

वृक्ष को सौंपती हूँ
वक्ष की अन्तस् की परछाईं
अपनी धड़कती आकाँक्षाएँ
मुँदे हुए स्वप्न
झुलसी हुई मन-देह
वृक्ष जिसे चुपचाप
कहता है अपने झूम-घोष से
जो तुम तक
हवाओं का शोर
बनकर पहुँचता है
मेरे मन का रोर ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें