सोमवार, 8 सितंबर 2014

।। धूप की धारदार आँच में ।।

























सादे कागज को
धूप की धारदार आँच में
सेंककर
और अधिक उजला किया

रात की स्याह हथेलियों के
अंधे छापे से बचाकर
कोरे कागज पर 
चाँद की तरल चाँदनी से भिगोकर
एकसार शब्द लिखे

बिना अक्षरों के
अनुभूत करनेवाली
अनुभूतियों की भाषा लिखी

सादे कागज को
चंचल हवाओं का
नरम सुख पिलाया

ऋतुओं की
बारीक गंध धागों से
मन के कोर बाँधे
सादे कागज पर
और कुछ पाँखुरी रखी
(फूल के अधूरे-अधर हस्ताक्षर)
कोरे कागज पर

जिंदगी के सूने पन्नों पर
ऐसे ही रचा जा सकता है
आत्मीय शब्दों का मोहक जंगल
बिना किसी अपेक्षा के

सादे कागज के
कोरेपन पर
झरने का शोर
झरता है शब्द बनकर

अनायास एक समुद्र-सा
उमड़ता है
मन की सीमाओं को तोड़कर
मन के भीतर ही
एक नया भाषा-समुद्र रचता हुआ

बिना ध्वनियों के
बारीक इबारत
आँखों के बिना
जिसे मन पढ़ता है
कोरा मन …

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