शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

।। शब्दों के पूर्वजों से ।।

























मन-वक्ष से
बिछुड़े हुए मन की
पसीजी हुई कशिश
तुम्हारी हथेलियों की
छूट गई है मेरी मुट्ठी में

फड़फड़ाती चिड़ियों की
स्तब्ध फड़फड़ाहट
ठहर गई है
मेरी साँसों में

तुम्हारी अनुपस्थिति की
तुमसे
कुछ कहने की कोशिश में
अपने शब्दों में
शब्दों के पूर्वज को
याद करते हैं

उन पूर्वजों में
खोजते हैं अपनी आत्मा के पूर्वज
शिकस्त पड़ी हुई आत्मा को
कुछ होश में ला सके
शब्दों में
पूर्वजों की स्मृति
स्मृति में शब्दों के पूर्वज ।

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