मंगलवार, 2 सितंबर 2014

।। तुम्हारे अंतरंग के अथाह तल पर ।।


















अगर सिर्फ
प्रेम कहना चाहती
तो बहुत सरल
कुछ शब्द लिख देती
कोरे कागज पर
सूखी रेत पर
और रच देती
प्रेम का पूरा संसार
तुम्हारे अंतरंग के अथाह तल पर

उजली महक की अनुभूतियों का
महाप्रस्थान
तुम्हारी भावना की वेदी में
समाहित होकर
चिर समाधि में विलीन होना चाहता है

मेरी बेबस बेचैन आत्मा की
उतप्त अकुलाहट
देह से परे जाकर
दूसरी आत्मा की देह को सुनना चाहती है

आत्मा-मुक्ति के लिए
भावना के नवाचार में बँधी
प्राण-देह
तितली की तरह
विकल होकर
उड़ने से अधिक
बोलना चाहती है
प्रेम के नए-नए शब्द
नए-नए रंग में

कहना मुश्किल कि
तितली के पंखों के रंगों में
कहाँ से आती है शहद-सी मिठास

वैसे ही, बिल्कुल वैसे ही
जानना मुश्किल
मन की प्रकृति में
कहाँ से शामिल होता है
प्रेम का सौभाग्य-सुख
बगैर किसी पूर्व-संकेत के ।

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