सोमवार, 10 नवंबर 2014

।। वसन्त के रंग ।।





















प्रेम
देह गुहा के भीतर
चमत्कार की तरह
घटित होता है
चकाचौंध करता हुआ
विस्मित करता है

प्रेम
देह-गुहा के भीतर
उजाले की तरह
घुसता है
प्रगाढ़ता के तन्तुओं को
रोशनी के आगोश में समेटता है
देह-भित्ति में
चित्रकार की तरह
रचता है
उर-उजली रेखाओं से
युगल की एकल अनुभूति

देह-भीत पर
स्पर्श की
कोमल कमनीय तूलिका से
देहावरण पर नहीं
देहाभ्यन्तर में
उभरते हैं प्रणय-चित्र
अमिट आत्मीय अभिन्न
कि पोर-पोर को
छू लेती है वह आत्मा
कि जिसके होने भर से देह
दो भित्तियाँ
एकात्म हो
देह-उर-भीतर
बनाती हैं -
खुद-ब-खुद 'घर'
प्रणय का
विश्वास का
समर्पण का

जैसे
शिशु अपना प्रथम घर बनाता है
माँ की कोख में
और अपनी धड़कनों से
लिखता है प्रथम इबारत
स्त्री के वक्ष पर

प्रणय का परिणाम फल
जो स्त्री के देह-वृक्ष पर फलता है
और देह-वक्ष पर वसन्त की तरह खिलता है ।

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