शनिवार, 15 नवंबर 2014

।। अर्क ।।



















संवेदनाओं की पोरों से
तुम्हें छूकर
सहेज लेती हूँ अन्तर्तम में
संबंधों की अनुभूतियों का अमृत-अर्क

पिघलता और घुलता हुआ
जो ओले की तरह गल जाता है पोर-पोर में

अमृत-अर्क
ऊर्जा से ऊष्मा में बदलता रहता है धीरे-धीरे
साँसों से साँसों में
जैसे आँव में पकती है
कच्ची मिट्टी

तुम्हारे होंठों के शब्द
तुम्हारी बेकल आँखों की तरह
उतर जाते हैं मन-सरोवर में
झील में
झिलमिलाते क्षितिज तट की तरह
उतरते हैं मुझमें
मुझसे मिलने के लिए
एकांत के आत्मीय क्षणों में

स्पर्श ने अपनी छुअन से
रचे हैं तुम्हारे अपरूप-प्रणय रूप ।

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