मंगलवार, 18 नवंबर 2014

।। चिट्ठी की आँखों में ।।

















चिट्ठियों में
आते हैं शब्द
चुपचाप   तुम्हारी तरह
दबे पाँव … बेआहट
तुम्हारी आँखों की तरह
मौन निहारते और निरखते हैं
चेहरे की चुप्पी
हँसते मुखौटे आँसू

मेरी आँखें
चिट्ठी के शब्दों से
पीती हैं तुम्हारे आँसू
और तुम्हारे शब्दों की आँखें
सोखती हैं मेरी विकलता
तुम्हारे शब्दों में होती है
तुम्हारी साँसों की आकुल-बेचैनी
और अकेलेपन की अकाट्य-कथा
संतप्त चित्त की रागिनियाँ
बजती हैं अहर्निश

चिट्ठी की
पत्र-पृष्ठ हथेली में
होती है
प्राणों की प्रणय-मुट्ठी
तुम्हारा विकल्प
तुम्हारे ही लिखे शब्द हैं
अभिन्न और चुप ।

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