शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

।। महुआ-सा प्रेम ।।





















प्रणय
तुमसे कुछ नहीं
सिर्फ …
अभय की नाव
दोना-भर विश्वास
महुआ-सा प्रेम चाहिए
… महकता और महकाता

बाँझ होती संवेदना के संबंधों को
जीने और जिलाने के लिए

मन पर जम आई
माटी की मटियाली पर्त को
धोने-बहाने के लिए

चूसे गए रक्त से
सूखी पड़ी पथराई देह के लिए

देह की भूख के लिए नहीं
मन की तृषा के लिए

आत्मा की पवित्र तृप्ति के लिए

आदम दृष्टि के
विद्युतीय दाह से
स्याह धब्बों को मेटने के लिए

धुँआई साँसों के
घुटन-भरे छल्लों से मुक्ति के लिए

मन पर पड़ती
धूसर-मार की कहानी को कहने के लिए

तनाव के उत्ताप-संसार के दबाव
संताप के रेशे-रेशे को खोलकर
तुम्हारी झोली में डाल सकें

प्रणय
तुमसे कुछ नहीं
सिर्फ …
अभय की नाव
दोना-भर विश्वास
महुआ-सा प्रेम
… महकता और महकाता

प्रणय-वृक्ष से झरे
पात की पर्णकुटी हो तुम
तन की ही नहीं
मौन मन की भी
रजत रज का सैकत तट
ब्रह्मानंद का ब्रह्मनद
ब्रह्मनद का प्रणय-तट

तरंग हथेलियों में
लहरों की अंजुलियों में
श्वेत-प्रणय-शंख
पवित्र प्रेमोन्माद से अनुगूँजित
मेरी हथेलियों में
तुम्हारा प्रणय शंखवत
साँसों से लगा
साँसों को सुनता
स्वप्न-साँस को
सच साकार करता
शंखनाद प्रणय निनाद

तुमने …मैंने साथ-साथ सुना …फिर सबने सुना
जिसकी प्रतिध्वनि उड़ान भरते पक्षियों की चहचहाहट में
शाश्वत गूँजती है हवाओं-सी बजती, बादल-सी चमकती,
बरसती है

तुम और मैं सुने या न सुनें
पर सुनाई देती है दिशाओं की धड़कनों में ।

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