सोमवार, 17 नवंबर 2014

।। सच के भीतर से ।।





















तुम
मेरे पास
सुख की तरह हो
जैसे - जड़ों के पास जमीन

तुम्हारा स्पर्श
मुझे छूता है
जैसे - सूरज छूता है पृथ्वी

तुम पढ़ते हो
मेरा सर्वस्व
जैसे - आँखें पढ़ती हैं सब कुछ
शब्द और साँसों से परे जाकर

तुम
मेरे पास
स्वप्न के सच की तरह हो
जैसे - आँखों के पास दृष्टि

तुम्हारे
सामने होने भर से
आँखों में जिए गए स्वप्न
घुल जाते हैं प्रणय-देह में
देह में उजागर होती हैं
स्वप्न की रेखाएँ और रंगत
पके अनाज-सी उठती है सोंधी-गंध

स्वप्न-भूख
तृप्त होती है
सिर्फ तुम्हारे
पास होने भर से
जैसे - हिम शिखर के निकट मेघ-देह हो
अपने में सिमटी
शिखरों से लिपटी
ग्लेशियर पर पिघलती हुई बरसने को आतुर ।

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