मंगलवार, 11 नवंबर 2014

।। पूर्वाहट के बगैर ।।




















प्रेम
अपनी पूर्वाहट के बगैर
गुपचुप … चुपचाप
पहुँचता है आपके भीतर
भीतर से -
कुछ और मुलायम करता हुआ
कुछ और कमसिन
कुछ और नाजुक
कुछ और पतला
कुछ और तरल
कुछ और सरल
कुछ और सूक्ष्म
कुछ और अधिक सूक्ष्मता से
भीतर-ही-भीतर थामता और समेटता है सब कुछ

प्रेम
अपनी पूर्वाहट के बगैर
आगमन के संकेत
साँसों की हवाओं में घोले बगैर
आँखों की कोरों से
दबे पाँव रिसकर पहुँचता है
नयनों की अनयन पारदर्शी झील में
ठहरता और प्रतीक्षारत रहता है
जीने के लिए अतृप्त सुख

प्रेम
चुपचाप
आपको चुराते हुए
आपके भीतर रहता है
जैसे
आकाश की शून्यता में ब्रह्माण्ड ।

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