बुधवार, 5 जून 2013

सूरीनाम देश के भारतवंशियों के संघर्ष की 140 वीं वर्षगाँठ

















सूरीनाम देश के भारतवंशी इस देश में अपनी पीढ़ियों के संघर्ष की आज 140 वीं वर्षगाँठ मना रहे हैं । एक संवेदनशील व्यक्ति और एक रचनाकार के रूप में पुष्पिता अवस्थी ने सूरीनाम के आर्थिक-सामाजिक-साँस्कृतिक परिवेश को तथा उस परिवेश में भारतीयों की सक्रिय भागीदारी, संलग्नता और योगदान को देखने/समझने का महती प्रयास किया है । अपने इस प्रयास को पुष्पिता ने अपनी विभिन्न रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त भी किया है । सूरीनाम से संबंधित उनकी रचनाओं के ढेर में से हम यहाँ उनकी एक कविता प्रस्तुत कर रहे हैं, जो उनके कविता संग्रह 'ईश्वराशीष' में प्रकाशित हुई है ।

।। स्मृतियों का नरम सुख ।।

सूरीनाम नदी-तट से
गंगा-तट के लिए चिट्ठी लिखने से पहले
सादे कागज को पारामारिबो की
धूपीली-धूपीली धारदार आँच में सेंककर
और अधिक उजला किया
रात की स्याह हथेलियों के
अंधे छापे से बचाकर
कोरे कागज को चाँद की
तरल चाँदनी से भिगोकर
एकसार शब्द लिखे
बिना अक्षरों के अनुभूत करने वाली
अनुभूतियों की भाषा लिखी

सादे कागज को
मन की चंचल स्मृतियों का
नरम सुख पिलाया
सूरीनाम की वासंती रंग-गंधी धागों से
मन-कोर बाँधे
प्यार के शब्द-बोल हवाओं में बोर-घोल
पाँखुरी से रखे
स्वदेश से बिछुड़े
जिंदगी के सूने पन्नों पर
ऐसे ही रचा जा सकता है
आत्मीय शब्दों का मोहक जंगल
बिना किसी अपेक्षा के

परदेश के कागज पर
झरने-सा झरता है स्मृतियों का आत्मीय-संवाद
अनायास कुछ समुद्र-सा उमड़ता है शब्द बनकर
मन की सीमाओं के भीतर ही
सीमाओं को तोड़ता हुआ
रचता है एक नया शब्द-सागर
भावना के नवाचार में बँधी-सधी प्राणदेह
तितली की तरह विकल होकर
उड़ने से अधिक बोलना चाहती है
अनुराग-राग के नूतन शब्द
अभिषेकी रंग में
कि कहना कठिन
तितली के पंखों के रंगों में
कहाँ से आती है शहद-सी मिठास
वैसे ही बिलकुल वैसे ही
जानना मुश्किल कि
कहाँ से शामिल होता है
मन की प्रकृति में
प्रेम का सौभाग्य-सुख
बगैर किसी पूर्व-संकेत के ।

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