रविवार, 16 जून 2013

।। परछाईं ।।




















सूर्य की
परछाईं में
होता है सूर्य
लेकिन ...

प्रकाश के
प्रतिबिम्ब में
होता है प्रकाश
लेकिन ...

सूर्य अपने ताप से
बढ़ाता है
अपनी ही प्यास
और नहाते हुए नदी में
पीता है नदी को

नदी समेट लेती है
अपने प्राण-भीतर
सूर्य को
और जीती है
प्रकाश की ईश्वरीय  प्रणय-देह
नदी
पृथ्वी में समा जाती है
धरती का दुःख कम करने के लिए
जैसे मैं तुममें ।

1 टिप्पणी:

  1. प्रेम की ऐसी छटा मैंने न कभी देखी, न सुनी और न ही इसका कभी तसव्वुर किया। इन कविताओं को पढ़ना मेरे लिए परम आनंद का अनुभव है। बहुत खूब पुष्पिता, बधाई, सस्नेह
    दिव्या माथुर
    वातायन : साउथ बैंक की कविता
    लन्दन
    vatayanpoetry@gmail.com

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