सोमवार, 17 जून 2013

।। मौन ध्वनि ।।


















सारी विध्वंसात्मक
कोशिशों के बावजूद
मेरे वक्ष का कोई शब्द
बिगड़ नहीं पाएगा ।

अनुपस्थिति में भी
धड़कनें सुनेंगी सही-सही
शब्दों की सार्थक अनुगूँज

बिना क्षितिज के दिवस होंगे
न सुबह होगी
न शाम होगी
चिड़ियों की पुकार में
घुलेंगे प्रेम के शब्द
उठाएँगे तुम्हें
तुम्हारे सर्वस्व के साथ
सर्वस्व के लिए ।

चह-चह में गूँजेगी राग-भैरवी
न ओस ...
न आवाज ...
लेकिन मेरा 'मौन' रहेगा प्रेम के साथ
प्रेम की तरह चुप
अंतहीन रिक्तता को भरने के लिए ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें