रविवार, 2 जून 2013

।। नवजात अश्वेत शिशु के जन्म पर ।।


















(एक)

बायीं बाँह की गोद में
अपने नवजात शिशु को लेकर
खुश है वह नवजात नीग्रो माँ ।

अपनी ही देह का जादू
देख रही है - हथेलियों में
अपनी ही देह के
खिले फूल से
खेल रही है वह ।

रह-रह कर सूँघती है
अपना ही जाया नवजात शिशु
जैसे वह हो कोई
उसकी देह-धरती का कोई अनोखा पुष्प
जीवित और जीवंत
उसके मृत्यु पर्यन्त
खिला रहेगा
बढ़ता और महकता रहेगा
अपनी माँ को खुश करने के लिए ।

(दो)

वह चुप है
और
खुश है
शिशु को वायलिन की तरह
अपने वक्ष से लगाये
नव-जीवन की धड़कनों के संगीत को
सुनने में व्यस्त है
उसकी साँसों की लय को
गुन और बुन रही है
अपने जीवन की लय में

शिशु की मुँदी पलकों को
अपनी प्रसव-पीड़ित थकी नयन-दृष्टि से
खोलने में लीन
अपनी कजरारी आँखों से
नवजात शिशु के चेहरे पर
बुरी नज़र से बचाने वाले काले टीके को
लगाने में आत्मलीन है ।

वह सुनती है सिर्फ
नवजात शिशु की धड़कनें
जिसमें जान लेना चाहती है
उसका सर्वस्व ।

वह अपने देहांश को
निरख रही है
और परख रही है
उसका तीन घंटे पहले पैदा हुआ शिशु
कितना है उसकी ही तरह
और कितना है अपने गोरे पिता की तरह
क्या आँखों का रंग है नीला और केशों का रंग सुनहला
या उसकी ही तरह हैं काली आँखें और काले केश

जानती है वह
अश्वेत होने का दुःख
विश्व के विकसित और सुसंस्कृत समाज में भी
संभ्रांत होने के बावजूद
दास और कुली होने की परछाईं
घुली रहती है उसके आकर्षण और ईमानदार व्यक्तित्व में
धनाढ्य होने पर भी
उसका पिता भोगता रहा है यूरोप और अमेरिका में
अपने पुरखों के दास और कुली होने का दंश
स्वयं के सरकारी महकमें की सलाहकार होने पर भी
गोरों की नीली आँखों से
झेलती रही है खुद के दुरदुराने का दुःख ।

(तीन)

शिशु को
अपने वक्ष से लगाये
याकि स्वयं उसके वक्ष से लगी हुई
वर्षों से बिछुड़ी
दुनिया के मायाजाल में भटकती
शिशु से पहले
बहुत कुछ या कि सब कुछ पाने की
अभिलाषा में
वह दौड़ती रही अब तक
और 'माँ' बनने से रही दूर
थक गई
तब 'माँ' बनी और जाना
बेकार हाँफती रही
तृष्णाओं की दौड़ में ।

स्त्री का
वास्तविक हासिल
'माँ' बनना है
उसकी जायी सन्तान
उसे 'माँ' बनाती है
वह 'निज-स्त्रीत्व' में
महसूस करने लगती है
ममत्व की झील
और वात्सल्य का झरना
देखते-देखते
वह स्त्री से प्रकृति में
              बदल जाती है
और समझ पाती है
माँ और मातृभूमि होने का
अलभ्य-सुख ।

(चार)

नवजात शिशु को
अपने वक्ष से लगाये
            लीन है नवजात नीग्रो माँ
प्रथम बार
अपने 'माँ' होने के सुख में
एकात्म और तल्लीन है

कभी
खिड़की से घुस आयी
बर्फानी उजली रोशनी में
निहारती है शिशु का ललछौंह गेहुँआ अश्वेत वर्ण
आनंद से चिहुँककर
मूँद लेती है प्रसव से भारी पलकें
और सोचती है
दासता से मुक्ति के अश्वेत-जाति के योद्धाओं का
यही था रंग
स्वतंत्रता की लड़ाई में रत
दक्षिण एशियाई देशों के नेताओं का
यही था रंग
गाँधी और नेल्सन मंडेला
जैसे अहिंसक दूतों का
यही है रंग
अपनी गोरी माँ
और पति के श्वेत वर्ण के बावजूद
जैसे उसने लिया है अपने पिता की तरह गेहुँआ अश्वेत वर्ण
                       धरती की माटी का रंग
                       उसी तरह उसके शिशु ने निभाई है
                       परंपरा गर्भ में ही

वैश्विक कानूनी हक़ों के बावजूद
गोरों की निगाह में हिकारत का दंश आज भी
नित घोलता है स्मृतियों में
दासता की काली स्याही
खेतों में गिरमिटिया और कन्ट्राकी की जगह
भवनों, अस्पतालों, स्टेशनों की सफाई में बतौर मजदूर
जुटे हैं आज भी
वह अफ्रीका हो या दक्षिण एशिया
या फिर कैरेबियाई देश
उनके अधिकारी होने पर भी
उन्हें देखा जाता है मात्र कर्मचारी ।

वैज्ञानिक सदी के
सत्ताधारियों की कोशिशों
और अंतर्राष्ट्रीय मानव-अधिकारों के संगठनों के बावजूद
गौरे आज भी बने हुए हैं
                      सर्वश्रेष्ठ
जबकि मछेरों
और लुटेरे योद्धाओं से अधिक
नहीं रहे कभी कुछ
और मानसिकता से
आज भी है वैसे ही भूखे और भुक्कड़ ।

शिशु जन्म-काल की कराह और चीखों से
सूज आये अपने करीयाये और पपड़ियाये ओठों से
चूम-चूम शिशु की पलकें
खोल देखती है
शिशु ने, पिता की नीली आँखों के बावजूद
लिया है अपनी माँ की ही आँखों का कजरारा वर्ण
कहीं अपनी नीग्रो माँ की तरह ही
उसकी आँखें भी न हो कजरौटा ।

नव शिशु की माँ
हर्षित है कि
उसकी संतान के केशों का रंग है काला
उसके केशों की तरह ही ।

पुख्ता होता है विश्वास
उसके गोरे पिता के बावजूद
               संतान की दृष्टि
               और अंतर्दृष्टि भी होगी
               वैसी ही मर्म भेदी
दुनिया के सच को
भाँपने वाली
अपने नाना और माँ की तरह ।

(पाँच)

नवजात माँ
हुलसित है कि
शिशु की त्वचा का रंग भी है उसकी तरह
'माँ' और मातृभूमि सरीखा
शोख, दमकता हुआ मटियाला सुनहरा
जो गोरों के बीच दिखता है
अलग से चमकदार

उसके जाये शिशु में है
उसकी पिता पीढ़ी का ही प्रजाति द्योतक वर्ण
अपने खून और रंग से
समझेगा अपनी पीढ़ियों का संघर्ष
वह भी
जारी रखेगा दोयम दर्जे के नागरिक होने के
संघर्ष का शांति-युद्ध

बगैर 'माँ' के कहे-सिखाये
करेगा वही सब कुछ
जो चाहती रही हैं
उसकी माँ की पीढ़ियाँ
वर्षों से
मानसिक आजादी का सुख ।

नवजात नीग्रो माँ
अपनी पहली संतान की
'माँ' बनकर खुश है
और
चुप है कि
नवजात शिशु के रूप में
उसने हृदय प्रतीक 'शांति-दूत' को जन्म दिया है
जो विश्व मानव-मन में रोपेगा शांति-बीज
और ख़त्म करेगा
श्वेत और अश्वेत मानव-जाति के बीच का
जानलेवा संघर्ष
जो उच्चपदस्थ होने के बावजूद
अश्वेतवर्णी मनुष्य
जीवन भर ढोता है दासता का इतिहास
                     अमिट काले धब्बे की तरह
वह अपने 'शिशु और सोच' से विहव्ल है कि
अपनी कोख की खदान से
                     खन निकाला है उसने
                     अमूल्य काला हीरा
                     मानव-देह रूप में ।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें