गुरुवार, 27 जून 2013

लय : विलय

























प्रेम में
साँसें समझ पाती हैं
साँसों की भाषा
जो देह की सिहरन से लेकर
कपोलों की लाली तक
एक है ।

मन की देह के बीच
अपनी लिपि में
अपने लय में
अपने शब्दों में
अपने अर्थ में
लय होगी विलय ।

एकांत में
राग की सुगंध
और सुगंध का अंगराग ।

अपनी गंगा में
जीती हूँ तुम्हारी यमुना
जैसे
अपने कृष्ण में
तुम मेरी राधा ।

प्रणय चाहता है
अपनी देह-गेह में
प्रिय का हस्ताक्षर
संवेदना की जड़ें
पसरती जाती हैं भीतर-ही-भीतर
कि देह-माटी
पृथ्वी के समानांतर
अपना वसंत जीने लगती है ।

प्रणयाग्नि से तपी देह
हो जाती है स्वर्ण-कलश
अमृत से पूर्ण ।

प्रणय
देह की ईश्वरीय चौखट पर
समर्पित करता है अपना सर्वस्व
जैसे विलीन होते हैं
पंच तत्वों में
पंच तत्व ...।

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