मंगलवार, 4 जून 2013

दो कविताएँ

























।। राग में शब्द ।।

प्रेम
आँखों में खुलता और खिलता है
आँख में दृष्टि बनकर रहता है ।

साँस की लय में रचे हुए शब्द
घुल जाते हैं अपनी लय में
जैसे राग में शब्द
शब्द में राग ।

प्रेम ने रचा है प्रेम
सारे विरोधों के बावजूद ।

सार्वभौम शब्द-गूँज
प्यार अनुगूँज
जिसमें भूल जाता है
व्यक्ति-स्व
और शेष रहता है
सिर्फ प्रेम ।
जैसे समुद्र में समुद्र
धरती में धरती
सूरज में सूरज
चाँद में चाँद
और प्यास में पानी ।

।। रेखाओं से परे ।।

नयन रचते हैं प्रणय की रेखाएँ
और ओंठ भरते हैं इन्द्रधनुषी गीले रंग ।

प्रेम
उजला और कोरा कागज है
शब्द और रेखाओं से परे
जिस पर
रचता है मन अनलिखी
जिसे
सृजनधर्मी ऊँगलियाँ पढ़ती हैं
और सुनती हैं
प्रेम का रूपवान
चेहरा बनकर ।

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