शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

।। शब्द-बैकुंठ ।।




















बादल
चुप होकर बरसते हैं
मन-भीतर
स्मृति की तरह ।

सुगंध
मौन होकर चूमती है
प्राण-अंतस
साँसों की तरह ।

उमंग
तितली-सा स्पर्श करती है
मन को
स्वप्न-स्मृति की तरह ।

विदेश प्रवास की
कड़ी धूप में
साथ रहती है
प्रणय-परछाईं ।

सितारे
अपने वक्ष में
छुपाए रखते हैं प्रणय-रहस्य
फिर भी
आत्मा जानती है
शब्दों के बैकुंठ में है
प्रेम का अमृत ।

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