रविवार, 6 अक्तूबर 2013

दो कविताएँ


 






















।। चिट्ठी के शब्द ।।

चिट्ठी के शब्द
पढ़ने से भ्रूण में बदल जाते हैं
मन के गर्भ में ।

वे विश्वास की शक्ल में
बदलने लगते हैं ।

शब्दों की देह में
आशाओं की धूप समाने लगती है
और अँधेरे के विरुद्ध
कुछ शब्द
खड़े होकर रात ठेलने लगते हैं ।

।। कैनवास ।।

बच्चे
अपने सपनों की दीवार पर
पाँव के तलवे बनाता है
लावा के रंग में
और उसी में सूरज उगाता है ।

आकाश उसका
नीला नहीं पीला है
सूरज उसके लिए
पीला नहीं लाल है ।

पेड़ का रंग उसने
हरा ही चुना है
उसी में उसका मन भरा है ।

बच्चे ने
सपनों के रंग बदल दिए हैं
अपने कल के कैनवास के लिए ।

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