सोमवार, 7 अक्तूबर 2013

।। हवा ।।




















हवाओं में
होती है आवाज़
अपने समय को जगाने की ।

चुप रहने वालों के खिलाफ़
बवंडर उठाने की ।

हवाएँ
चुपचाप ही
आँधी बन जाती हैं ।

हवाएँ
बिना शोर के
तूफ़ान ले आती हैं ।

हवाएँ
हमेशा पैदा करती हैं आवाज़
प्रकृति के पर्यावरण को
हवाएँ पोंछती हैं
अपनी अलौकिक हथेली से ।

हवाएँ गूँजती हैं धरती में
जैसे देह में साँस ।

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