बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

दो कविताएँ


 















।। अपने ही अंदर ।।

आदमी के भीतर
होती है एक औरत
और
औरत के भीतर
होता है एक आदमी ।

आदमी अपनी जिंदगी में
जीता है कई औरतें
और
औरत ज़िंदगी भर
जीती है अपने भीतर का आदमी ।

औरत
अपने पाँव में चलती है
अपने भीतरी आदमी की चाल
बहुत चुपचाप ।

आदमी अपने भीतर की औरत को
जीता है दूसरी औरतों में
और
औरत जीती है
अपने भीतर के आदमी को
अपने ही अंदर ।

।। शंख ध्वनि ।।

स्त्री
शब्दों में जीती है प्रेम
पुरुष
देह में जीता है प्रेम

स्त्री
आँखों में जीती है रात
और पुरुष
रात में जीता है स्त्री ।

स्त्री
शंख ध्वनि में
जीती है आस्था के स्वर
पुरुष
शंख देह में
भोगता है विश्वास-रंग ।

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