बुधवार, 4 दिसंबर 2013

।। गठीले हाथ ।।


















वे हमारी खुशियों को रचाने में
शामिल हैं
जिन्हें हम नहीं जानते हैं
पर वे पहचानते हैं
अपने से अधिक हमारी खुशियाँ
खुशियों का स्वाद
रंग-रूप और चाल-गति ।

उनके हाथों से
रचा जाता है सुख का संसार
हम सिर्फ
खरीदते हैं जिसे ।

बड़े लोग
मानते हैं रुपया खुशी है
छोटे लोग
जानते हैं मेहनत मजूरी ।

नया साल आने से पहले
फड़फड़ाने लगता है कागजों का सफ़ेद सीना
मशीनों के नीचे
और उनके पीछे
मेहनत-मजदूरी वाले गठीले हाथ
जहाँ बदलती हैं तारीखें
और सपने भी ।

कम्प्यूटर की बटन
करती है अग्रिम बुकिंग
नए साल में
नए देश में
नए होटल में.… ।

समय भी जागता है जैसे तब
अपनी करवट में अंक बदलता है
तीन सौ पैंसठ दिन जैसे
पहनने के लिए वस्त्र हों ।

समय देखता है जागकर
नए वर्ष का चश्मा लगाकर
और हम नए ढंग से सोने के उपाय बाद
सो चुके होते हैं
पटाखों के शोर और शराब के स्वाद बाद
देर रात सो चुकने के बाद
देर दोपहर जागते हैं लोग ।

जबकि
घर में न समाने वाले
छोटे बच्चे घर-बाहर
बीन चुके होते हैं
छूटे हुए पटाखों के बुकले
अपने सपनों में उजियारी बारूद
भरने के लिए ।

जबकि हम सो चुके होते हैं गहरी नींद
वर्ष भर के लिए ।

वर्ष भर बाद, वर्ष बदलने की आहट पर
फिर जागते हैं
नए ढंग से खाने-नाचने और सोने के लिए ।

हमारी खुशियों में
लग जाता है हर छोटा आदमी
हमारे सपनों से जोड़ देता है अपनी आँखें
और हमारी हँसी में अपनी खुशी
कि अपने शिशु और पत्नी के नववर्ष के सपने भी
भूले से भी नहीं कौंधते हैं उसके भीतर
हमारी सेवा की भाग-दौड़ के कारण ।

हम सब की मुस्कराहटों में
भूल जाते हैं वे
अपने बच्चे की खिलखिलाती बाँहें
अपनी पत्नी की सुहराती मुस्कराहट ।

उनकी अभ्यासी हथेलियाँ
ड्रमिंग या प्यानो या किसी भी वाद्य-यंत्र पर
थिरकती हैं
उनके पाँव दौड़ते हैं
खुशियाँ खरीदने वालों की मेजों की ओर
शैम्पेन और वाइन की बोतल में बंद
खुशियों को कार्क से बाहर करने के लिए ।

वर्ष बदलने पर भी
उनकी तकदीर और उम्र के भीतर भी
वर्ष का बदलता है हर्ष
जिसकी परवाह किए बगैर
दौड़ाते रहते हैं टैक्सी, बस, ट्राम, ट्रेन, जहाज
सीमाओं की सरहदों पर
लगे रहते हैं घर-द्धार छोड़कर
मेहनतकश छोटे लोग ।

फैक्टरियों से बाहर निकलकर
नाचने लगती हैं फुलझड़ियाँ
पटाखे मचाने लगते हैं शोर
रंगों का चमकता-दहकता रंगीला शोर
बारूद को खुशी में बदलने में
लगे हुए हैं वे लोग
जो अपनी जिंदगी को बदलना चाहते हैं
खाती-पीती अँधाधुंध सुख भोगती दुनिया में ।

ख़ुशी उगाने के बीज बने हुए
वे धँसे हैं चुपचाप
समय की जमीन के भीतर ।

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