मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

।। कवि श्रीनिवासी ।।

























श्रीनिवासी कवि ने
अपनी जन्मभूमि में
कलम-हल से बोए हैं शब्द बीज ।

सूरीनाम को
जिलाया है अपनी कविता में
अपना खून देकर ।

सूरीनाम धरती पर
बूढ़ा हो रहा है सूरीनाम
पचासी वर्ष के होने पर भी
अपनी कविता में है जवान
कंधे पर हल लिए हुए
किसान की तरह ।

न्यू एम्स्टर्डम के
नदी तट पर
कविता का आकाशदीप
लिए हुए खड़ा है कवि
जिसकी तस्वीर की
सजल आँखों में
बची है स्याही
अपनी नई कविता के लिए ।

न्यू एम्स्टर्डम के
जंगल होते हुए तट पर
शताब्दियों का दुःख जीते-जानते
वृक्षों की तरह खड़ी है कवि की कविता ।
जिस तरह शाखाओं पर पक्षियों ने बसाए हैं
नए पौधे … नई लताएँ … नई जटाएँ और नए घोंसले ।
कवि की कविता की तरह ।

किसी ज़माने में इसी तट पर
 मातृभूमि के पक्ष में
माँ की तरह लड़ती हुई तोपें आज चुप पड़ी हैं
अपनी ही संतानों के कंधे पर सिर टिकाए हुए ।

तट के पुलिस थाने की चौखट पर
पहरेदार की तरह तैनात
खड़ी है श्रीनिवासी की कविता हथियार की तरह
मातृभूमि के पक्ष में ।

कविता ही न्यू एम्स्टर्डम का स्मारक है
और सूरीनाम का स्मृति-चिह्न
पुलिस स्टेशन के झंडे तले
फहराती है अलग से
कविता की शांति पताका ।

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