शनिवार, 7 दिसंबर 2013

।। कवि माइकल स्लोरी ।।

























माइकल स्लोरी
सूरीनाम की धरती का
चलता फिरता मानव-बॉक्साइट
जिसके शब्द
स्वर्णगर्भी धरती के
भूगर्भ से निकले खरा सोना ।

बॉक्साइट और सोने की तरह
खरे हैं माइकल स्लोरी
भूमध्यरेखीय सूर्य-ताप की स्वर्ण-सुरा को
घुमंतु माइकल की खोपड़ी
पीती  है दिन-दोपहरी ।

वर्षाधिक प्राचीन
धूप से झुलसते
वृक्षों की छाया तले
नहीं सुस्ताते हैं माइकल
शब्द उन्हें चलाते रहते हैं
शब्द-सखा सहचर हैं माइकल स्लोरी ।

चिड़ियों की ध्वनि-गूँज से
अपनी कविता के रचते हैं शब्द
कभी जिसमें मन-भीतर की चीख
कभी अंतस का उल्लास
खदानी मजदूरों की तरह
लातीन अमेरिकी उपमहाद्धीप के
बहुदेशीय मानव-मन की खदानों से
खनते हैं अपनी कविताएँ ।

देश के डच भाषी अख़बार में
प्रति सप्ताह होता है
उनके मन की आँखों का
जीवंत दस्तावेज ।

पाँवचारी करते हुए माइकल
जोड़े रखते हैं
अपनी देह-माटी को
सूरीनाम की सबानाई माटी से ।

अंतर्दृष्टि की जड़ें फेंक
धरती पर
उगाए रखना चाहते हैं
मानवीय मूल्यों के लिए
मानव-वृक्ष
सूरीनामी जनजीवन का वंशवृक्ष ।

विज्ञापनी लिफाफे के
रिक्त हिस्से की
सूनेपन की पुकार
जैसे सुनते हैं माइकल
अपनी हस्तलिपि में लिखते हैं
जन-मन की हार्दिक भाषा
ग्व्रीचबी पक्षी के लिए
शब्द हैं उनके पास
जैसे अख़बार में कहने के लिए अपनी बात
कोरे और ताजे शब्द
प्रतिदिन के सूर्य की धूप की तरह
या नई खुदी खदान की तरह ।

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