सोमवार, 16 दिसंबर 2013

।। अपनों की याद में ।।


















(एक)
विदेश-प्रवास में
तपन और पाले में
एकाकी पड़ा है मेरे मन का चबूतरा
जैसे हवा में
किसी स्मृति-घाव का
गीला निशान ।

इच्छाओं के नाव-घर से
ढूँढ़ती हैं बूढ़ी आँखें
बीते कल
उजले अतीत ।

प्रिय की स्मृति में
अपनी ही अंजुलि में
अपना चेहरा टिकाए
कि मेरी हथेलियाँ
उसकी ही हथेली हो
बैठी हैं
स्वदेशी इच्छाएँ
आत्मसुख के लिए ।

(दो)
बेआबरू मौसमों की तरह
पड़े हैं सपने
आँखों के कोने में
एकाकी परदेश प्रवास में
सूरज की सेंक में
सुलगते हैं स्वप्न
जिंदगी फिर भी
रचती रहती है नए नए ख्वाब
विदेशी मित्रों की तरह ।

विदेश में
याद आती हैं सहमी हुई स्मृतियाँ
चाँदनी से भी झरता रहता है अँधेरा
पूर्णिमा की पूरी रात
अकेले में
'उदास' शब्द के
गहरे अर्थ की तरह ।

इच्छाएँ माँगती रहीं
नए पत्ते
जहाँ साँस ले सके इच्छाएँ
और उनसे जन्म ले सकें
अन्य नवीनतम इच्छाएँ ।

इच्छाओं के साँचे में
समा जाती हैं जब भी इच्छाएँ
जिंदगी हो जाती है जिंदगी के करीब
जैसे कागज के आगोश में
होती है कलम
कुछ कहने को बेक़रार
कलम की स्याही से अधिक
देह की स्याही से लिखने को बेचैन ।

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