शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

।। बच्चों के सपनों के लिए ।।

























बच्चों के बड़े होते ही
खिलौने छोटे हो जाते हैं
माँ खिलौनों को
सहेज-सहेज रखती है
बच्चों के विदेश जाने पर
उनके छूटे हुए बचपन को
फिर-फिर छूने की अभिलाषा में ।

बच्चे जान जाते हैं जैसे ही
खिलौनों के खेल में
छुपे जीवन के झूठ को
घर-बाहर हो जाते हैं
जीवन के सच की तलाश में ।

माँ ढूँढ़ती रहती है
खिलौनों में छिपी उनकी ऊँगलियों को
अपने बच्चों के मुँह में लगाए गए
खिलौने को चूमती है
विदेश पढ़ने गए बच्चे के
बिछोह को भूलने के लिए ।

खिलौनों में बची हुई
बच्चों की स्मृतियों को
छू-छू कर वह कम करती है
अपनी स्मृतियों की पीड़ा
अपनी यादों में रखती है वह
अपने बच्चों के खिलौने
यह सोचकर कि
आखिर उसकी ही तरह
खिलौने भी याद करते हैं उसके बच्चों को ।

पुरानी तिपहिया साइकिल को भी
कभी खड़ा कर देती है सूने बगीचे में
और याद करती है बच्चों के पाँव
जो अब मिलिट्री की परेड में हैं
या वायुयान की उड़ान में
या अपने देश की सुरक्षा में
या देशवासियों की सेवा में ।

अभी भी बचपन में गाई गई
तुलसी की चौपाई को
ई मेल में लिख पठाती है
रामचरितमानस ही नहीं
जीवन का सार भी
'पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं' और
'जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू
सो तेहि मिलहिं न कछु संदेहू' ।

बच्चे
खिलौनों के जानवर को छोड़
निकल पड़ते हैं
आदमी के भीतर छुपे
हिंसक जानवरों के विरुद्ध
जंग जीतने के लिए ।

बच्चे
खिलौनों के कार और जहाज को छोड़
निकल जाते हैं
हवाई जहाज में
एक नई जिंदगी की तलाश में
जो उनके माँ-बाप की दुनिया से बेहतर हो
जिसे कभी
बचपन में पिता की छाती से लग कर
धड़कनों में सुना था
कभी माँ की आँखों के झूले में
सपनों की तरह देखा था ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें