गुरुवार, 22 अगस्त 2013

'विन्टरकोनिंग' कहानी का एक और अंश (4)


















पिता की देह में ही जिस माँ की जान थी और जीवन था वह माँ अब पिता के बिना अकेले वृद्धालय में रह रही हैं । उनके इस भीतरिया दुःख को शेखर और शीला अपनी रगों में महसूस करते हैं । शीला और शेखर रोज़ ही साँझ को समय निकाल कर उनके पास जाते हैं । यूरोपीय वृद्धालय का उबला हुआ खाना … माँ को भला कहाँ तक भाता होगा । यद्यपि बूढ़े लोगों का सारा खर्च सरकार उठाती है और प्रति बूढ़े व्यक्ति पर साढ़े तीन हज़ार यूरो हर माह खर्च करती है । ओल्ड हाउस में मनुष्यों की जरूरतों का बसा-बसाया कैम्पस-घर होता है । फिर भी दस-दस बच्चे पालने वाली माँ के लिए घर का कोना भी घर होता है । वह अपने लक्ज़री से पूर्ण कमरे से भी या तो हमेशा सड़क देखती रहती है या तो पाँचवीं मंजिल से झाँक-झाँक कर शेखर और शीला के आने की, पहचानने की कोशिश करती रहती है और अँधेरा होने पर अपने कमरे में अध-अँधेरा किये - दरवाज़े की ओर मुँह ताके आरामकुर्सी में बेचैन बैठी रहती है कि कब वे दोनों आयें और माँ के बुढ़ापे के अकेलेपन के अँधेरे को दूर करें । अपनी आँखों के उजाले से माँ की बूढ़ी आँखों में देखने की रोशनी दें ।
'ममा' शब्द सुनकर शेखर की माँ जैसे जीवन पा जाती हैं । प्रतीक्षा की कशिश से मुरझाया चेहरा खिल पड़ता है । यद्यपि बुढ़ापे ने उनकी देह की कांति को खुरचकर उस पर झुर्रियों की पर्तें चिपका दी हैं । बावजूद इसके झुर्रियों के बीच से भी शेखर और शीला को देखने का सुख रिस आता है जिसे पीकर शीला की आँखें भी बहुत आत्मीय आनंद से जीती हैं ।
आठ बज रहा था । वैसे वे दोनों रोज़ ही सात बजे तक कुछ पका हुआ भारतीय स्वाद का खाना और संतरे या अनन्नास का जूस लेकर पहुँचते थे … पर आज देर हो गयी थी ।
बयासी वर्ष की बूढ़ी देह की करिहाऊँ और पीठ पिरा आई होगी । पीठ के साथ-साथ गर्दन भी कुछ झुक और लटक गयी होगी । यह सोचकर शीला कुछ तेज़ बढ़ी । दोनों लिफ्ट के भीतर हुए । लिफ्ट के आईने में एक-दूसरे ने अपने को निहारा । हल्का-सा निरखा । फिर एक-दूसरे की आँखों में … और मुस्कराकर होंठ चूम लिये । पाँचवीं मंजिल आयी । लिफ्ट का दरवाजा खुला । वे कॉरीडोर से होते हुए पाँच सौ पाँच नंबर के अपने माँ के कमरे के सामने पहुँचे । दस्तक दे कर उन्होंने दरवाजा धकेला ।
आधे कमरे में अँधेरा था और उस अँधेरे में माँ उदास बैठी हुईं थीं । लेकिन दरवाजे के खुलने से उनके सिकुड़े होठों में मुस्कराहट ने भी जैसे अपने कपाट खोल दिए थे ।
माँ की बगल में अपनी कुर्सी खींचते हुए शीला ने पूछा, 'ममा ! दोपहर में क्या खाने को मिला था ?'
'अरे कुछ न पूछ … वो ही रोज़ की नाई उसनन आलू और पोई की भाजी … और एतत लम्बका रहा … हम न जानी कौन चीज़ का गोश रहा … हम न खइली ।' हर दिन की तरह बड़े उदास मन से माँ ने कह दुहराया । शीला रोज-रोज यही किस्सा सुनकर मन ही मन खीझ उठी थी ।
'माँ, अभी तुम्हें बीस बरस और जीना है' - माँ में नये तरह का उत्साह भरने के उद्देश्य से अतिरिक्त जज्बे से शीला बोली ।
'अरे, न बोल अइसन ।' माँ ने बरजते हुए कहा ।
'पता नहीं, इसके बाद कौन और कैसी दुनिया में जाओ । यहाँ तो हम सब हैं … सब सुख है । तुम्हारी तंदरुस्ती अच्छी है । एक दवाई नहीं लेनी पड़ती है और क्या चाहिए तुम्हें ?' शीला ने हार न मानते हुए माँ को फिर हिम्मत बँधाने की कोशिश की ।
'न अअअ … अब हम हियाँ न जिअब … । थक गइली हई । बहुत भइल' माँ ने बहुत बुझे हुए मन से लेकिन दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया ।
'काहे ?' शीला तपाक से माँ के लहजे में पूछ बैठी ।
'अरे, अब तोके का बताई हुँआँ … ऐकेर बप्पा हमार बाट जोहत बाटें । जब, तब सपना में आवे हैं … अब्बे काल सपना में आये रहें तो बोलत रहे कि हम बहुत दिन से भात न खइली हई । मकई के दाना भूज-भूज के भूख काटत बाटी । हमार शर्टवा भी बहुत दिन से न धुलल है … और अब का-का बताई ?' बोलकर माँ चुप्पी लगा गयी । जैसे वह यहाँ बेवजह फँसी हुई है … उनकी जरूरत और दरकार तो बस बप्पा के पास ही है । वह उन्हीं के लिए बनी हैं और बप्पा की दुनिया में ही उनकी दुनिया है ।
सुनकर शीला की आँखों में आँसू भरभरा आये । प्रेम… पति से प्रेम … और पति के प्रेम के विश्वास के साथ ऐसा अटूट लगाव … वह भी इस युग में । जहाँ दुनिया ही बदल गई है । दूसरा विवाह या इतर संबंध जैसे जीने की जरूरत बन गये हों । संबंध स्वार्थ के पर्याय बनकर बचे हुए हैं । सेवा और त्याग सिर्फ़ होठों के लिए शब्द के रूप में शेष हैं । वहाँ बयासी वर्ष की माँ आज भी पिता की सेवा के लिए उनके ही लोक जाना चाहती हैं, जहाँ वे हैं । जबकि ख़ुद की जर्जर देह की हालत यह है कि कोई नहलाये तो नहा लेंगी । कोई खाना सामने रख दे तो अपने काँपते से किसी तरह से कौर अपने मुँह में धर लेंगी । ऐसी हालत में वह बप्पा खातिर भात बनाने और शर्ट धोने के लिए यह धरती छोड़कर भागना चाहती हैं । यूरोप का चकाचौंधी लास्य उनकी धुआँई आँखों को अपनी चमक की बाँहों में नहीं समेट पाता है । अभी भी इनकी आँखों में चइला से सुलगने वाले चूल्हे की आग ही भभकती रहती है जिस पर हँड़िया धरकर वह बप्पा के लिए जब-तब भात बनाकर इंतज़ार करती रहती हैं ।
इस दिल हिलाने वाली भावुक संवेदना में धँसकर शीला माँ से आगे बातें न कर सकी । माँ को हँसाने का साहस उसके भीतर से निकल गया था । उसने भीतर ही भीतर अपने आँसू सोखते हुए माँ के कपड़े बदले । सोने के लिए गाउन पहनाया । उनके नकली दाँतों का सेट मुँह से निकलवाकर अपने हाथ में लिए । टूथब्रश से साफ करते हुए सोच रही थी, ममा अब नकली दाँतों में नकली हँसी लेकर नहीं जीना चाहती हैं लेकिन जैसे वह हर रात ममा के नकली दाँतों को सुबह की मुस्कराहट के लिए चमका देती है, यदि वैसे ही मुस्कराहट भी चमका सकती तो माँ के अकेलेपन का दुःख भी दूर हो जाता और इससे शीला तथा शेखर के मन में माँ के हार्दिक विषाद को लेकर जो पीड़ा है वह भी कुछ कट जाती ।
शेखर ने रोज की तरह माँ को बिस्तर पर लिटाया । उनके गाल चूमे और अच्छे से सोने को कहा । शीला ने अपने मन को सँभालते हुए और माँ के मन को हल्का करने के लिहाज से कहा, 'ममा, हमें डर है कि बप्पा का सपना देखने में कहीं तुम हम सबको छोड़ कर चली न जाओ । इसलिए आज सपने में हमें देखना …. ।' शीला का कहना अभी ठीक से पूरा भी न हुआ था कि 'बप्पा जब सपना में न आवे हैं तो मुनिया गाय का सपना देखीला । बड़ी भली रहल… । एक पुकार में धौरत आवत रहा । तोकै तो पूरा दिन जोह्वे के पड़ेला … ।' ममा ने पूरी ताक़त से ज़ोर लगाकर अपनी बात ही नहीं बल्कि अपने मन की पीड़ा भी कह डाली ।
शीला ने माँ के कपोलों को चूमा । उनकी ममता पगी और प्रेमरसी आँखों में अपनी भीगी आँखें डाल दीं । आँसू के दो बूँद माँ के होठों में गिरे ।
'रोओ न … अब्बे तो हम बाटी … । राम-राम बोल ।' माँ ने सधी आवाज में कहकर बिदा ली । शेखर और शीला का मन आज माँ की उदासी से अतिरिक्त बोझिल था और उनके लिए इस बोझ से मुक्त होना मुश्किल हो रहा था ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें