शनिवार, 24 अगस्त 2013

'विन्टरकोनिंग' कहानी का एक और अंश (5)


















शेखर और शीला घर पहुँचे । शेखर ने विशेष चाभी लगाकर अपने अपार्टमेंट का प्रवेश-द्धार खोला । लिफ्ट का बटन दबाया । लिफ्ट में उन्हें अपनी ही बिल्डिंग की ओल्ड डच लेडी रित मिली । उनका चेहरा बहुत उदास था । शीला ने आगे बढ़कर उनसे पूछा, 'सब कुछ ठीक है …।' रित ने धीमी और रूँधी हुई बुझी आवाज में डच में जबाव दिया । 'परसों रात ग्यारह बजे विम को ब्रेन हेमरेज हो गया था । चेहरा और सिर बुरी तरह सूज और फूल गया था । मैं तो बहुत डर गई थी । अब बायाँ हाथ-पाँव पैरालाइज्ड हो गया है …न कुछ देख पाते हैं और न बोल पाते हैं …पूरे सिर में खून इस तरह फैल गया है और भर गया है कि कैट-स्कैनिंग भी नहीं हो सकती है अभी । वह जब थमे तो ठीक से ईलाज शुरू हो । मैंने तो डॉक्टर से कह दिया है कि ऐसी स्थिति में इन्हें मरने की दवा दे देना क्योंकि ऐसे व्यक्ति के साथ अपनी ज़िंदगी लेकर जीना बहुत मुश्किल है ।' रित एक साँस में पूरी बात कह गयी थी । सुनकर शीला सन्न रह गयी थी । विम के ब्रेन हेमरेज की खबर सुनकर वह इतना आश्चर्य और दुःख से नहीं चौंकी थी जितना रित की कहनी से वह डर गयी थी ।
पिछले ही साल रित के पचहत्तर साल पूरे होने की खुशी में विम ने दौड़-भाग करके सारी तैयारी की थी । सबके दरवाज़े-दरवाज़े दस्तक देकर न्यौता दिया था । शैम्प्येन पिलाई थी । शीला को विम के इस उत्साह से इतनी खुशी हुई थी कि ऊपर अपने अपार्टमेंट में जाकर, कैमरा लाकर, इन दोनों की कई तस्वीरें बनाई थीं । जैसे लोग नवविवाहित होने पर पोज़ और मुद्राएँ देकर फोटो खिंचवाते हैं, वैसे ही उन्होंने फोटो खिंचवाईं । इस उम्र में भी विम ही घर-बाहर का सब काम देखता था । किचन से लेकर गैराज और गार्डन तक उसके जिम्मे था । कपड़ा, बर्तन धोने से लेकर कार ड्राइव करने तक का काम भी वही सँभालता था । तभी तो रित की झुर्री लिपटी हथेली में भी गुलाबी नेल पॉलिश दमकती रहती थी और पचहत्तर वर्ष की उम्र में भी रित की मुस्कान चमकने से पहले गुलाबी लिपस्टिक की चमक लोगों की आँखों में चिपक जाती थी । रित के बुढ़ापे का यौवन विम की सेवा से खिला हुआ था । वह रित आज विम के ब्रेन हेमरेज होने पर उसके मर जाने की इच्छा रखती है । इतना तक प्यार नहीं कि कुछ तो सेवा कर ले …। आखिर विम को ब्रेन हेमरेज के बाद यह तो सदमा न लगे कि जिसका उसने जीवन-भर ख्याल रखा …सेवा की, प्यार किया, वह कुछ माह भी न सँभाल सकी उसे । आखिर कितने दिन अब वह और ठीक से जियेगा ? लेकिन रित …आह ? ऐसा नहीं सोचती है । वह ज़िन्दगीभर अपने लिए जीती रही थी । और आज भी सिर्फ़ अपने लिए जीना चाहती है और शेखर की माँ, बप्पा के न होने पर आज भी बप्पा के लिए जी रही है और सपने में भी उनकी ही सेवा के बारे में सोचती है ।
शीला को समझ में नहीं आता है कि आखिर ज़िन्दगी कैसा कौर है जिसे कितना भी खा ले, पर उसका पेट नहीं भरता है और कोई है कि चखते ही वह उसे दुबारा अपने मुँह में नहीं रखना चाहता है । ज़िन्दगी और प्यार का स्वाद हर एक के लिए अलग है इसलिए भूख भी अलग और चाहत भी अलग …साथ ही उसको पाने के तरीके और भी अलग …और भी अनोखे…।  

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