रविवार, 11 अगस्त 2013

'विन्टरकोनिंग' कहानी का एक और अंश (3)

























शीला ने शेखर को याद दिलाया कि 'आज मेयर की वेलकम रिसेप्शन पार्टी में जाना है । शाम छह से आठ बजे के बीच का समय निर्धारित है । अभी घर चलकर फ्रेश-अप भी होना है ।' सुनते ही शेखर तेज क़दमों से अपनी कार की ओर बढ़ा । सौ से एक सौ बीस के आस-पास की एलाउड स्पीड से चलती हुई कार भी भीतर की हड़बड़ी के कारण रेंगती हुई महसूस हो रही थी ।
विन्टरकोनिंग के अपने घर से जल्दी से फ्रेश होकर … ड्रेस बदल कर शीला और शेखर सिटी सेंटर के रिसेप्शन हॉल पहुँचे । न कोई चेकिंग … न कहीं कोई किसी तरह की पुलिस … न कहीं मेटल डिटेक्टर … न कहीं पास । अख़बार में ख़बर थी कि जो भी मेयर से मिलना चाहता है उसका स्वागत है । हाउस इस ओपेन फॉर ऑल । खास लोगों के बीच आम लोगों की भीड़ शीला को मोहक लगी । वे दोनों ओवरकोट रखने के यार्ड की ओर बढ़े । अपने ओवरकोट दिए । शेखर ने 'नंबर-कार्ड' अपने कोट की जेब में डाल लिए । वाइन … शैम्प्येन, जूस ट्रे में लिए हुए टीन एज़र वेटर लड़की आयी । शेखर और शीला ने शैम्प्येन ली । चियर्स कहा और मेयर से हाथ मिलाने वाले लोगों की लाइन में खड़े हो गए ।
सिटी मेयर अपनी पत्नी के साथ नीदरलैंड देश के झंडे के बगल में खड़े थे । हाथ में ली हुई वाइन और शैम्प्येन की लोग चुस्कियाँ लेते जा रहे थे, आपस में हाथ मिलाते हुए मुस्कराहट और बातों की चुस्कियाँ भी अजनबी चेहरों से रह-रह कर सोख रहे थे । इस तरह से वह धीरे-धीरे सरककर आगे बढ़ रहे थे और मेयर के करीब पहुँच रहे थे । कुछ के हाथों में मेयर के स्वागत के लिए फूलों के गुलदस्ते और प्रेजेंट थे । किसी को हड़बड़ी नहीं थी । सब कुछ सहज गति से बढ़ रहा था ।
शीला ने देखा कि मेयर के सचिव जो शेखर के अच्छे दोस्त भी हैं और क़िले में संपन्न हुई शेखर की भव्य शादी में अपनी पत्नी के साथ आये थे, फेमिली डिनर में भी शामिल होकर आधी रात के बाद तक रुके रहे थे । विवाह की फ़ोटो भी दूसरे दिन ई-मेल द्धारा भेजी थी । उस रात जाते-जाते कान में कहा था, 'हनीमून का खुमार उतर जाये तो सुबह ई-मेल चेक कर लेना, वैसे तो तुम जैसे लोगों की शादी की हनीमून का खुमार कई साल रहेगा ।' यह उन्होंने डच में कहा था जिसे शेखर ने रात में शीला को बताया ।
शीला को सामने पाकर डच पुरुष सचिव बॉसमान ने आगे बढ़कर तीन बार शीला से अपने गाल मिलाये । शेखर से हाथ मिलाया । हालचाल पूछा । शीला को शुरू में शेखर के दोस्तों से गाल मिलाते और चूमते हुए बहुत अजीब लगता था । घर की कॉलबेल बजने पर वह दरवाजा खोलने के लिए नहीं बढ़ती थी … और सीटिंग रूम में थोड़ा देर से ही दाखिल होती थी । सामने वाला गालों तक न पहुँचे इसलिए वह हाथ मिलाने के लिए पहले ही आगे बढ़ जाती थी । फिर भी वह 'किस' करके अभिवादन करने की परंपरा से छूट नहीं पाती थी । साथ में जिनके पत्नियाँ होती थीं वह शेखर का गाल चूमती थीं और शेखर उनका … और उनके पति शीला की ओर बढ़ लेते थे । स्वागत का यह प्रेम पूर्ण सलीका … शीला को हमेशा आश्चर्य में डाले रखता था । जब भी वह दूसरे आदमी के गाल का स्पर्श अपने कपोल पर अनुभव करती थी … उसकी दाढ़ी चुभती हुई महसूस होती थी … जबकि शेखर की दाढ़ी रात में भी नहीं चुभते हुए महसूस होती थी । अपने विवाह के रिसेप्शन में सबसे इस तरह से शुभकामनाएँ लेते हुए शीला के कपोल लला ही नहीं भभा भी आये थे ।
सचिव से मिलने के बाद शीला ने मेयर से हाथ मिलाया । अपना परिचय दिया । शेखर ने उनकी पत्नी को बधाई दी और शुभकामनाएँ सौंपी । बिजनेस टर्म्स की कुछ बातें हुईं । मेयर ने शेखर से कंपनी का कार्ड माँगा । देखते ही सचिव लपककर मेयर की ओर झुका और बोला, 'अरे सर, इनका पूरा कच्चा चिटठा मेरे पास है ।' हम सब मिलकर हँसे ।

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