बुधवार, 7 अगस्त 2013

'विन्टरकोनिंग' कहानी का एक और अंश (2)



















"शीला बियर सिप करते हुए सोचने लगी । अभी कल ही तो वह गई थी एम्सटर्डम … । लाल स्टॉप लाइट पर उसने अपनी कार रोकी थी कि सड़क पार करने के पैदल चलने वाले रास्ते पर सामने ही यूरोपीय सज्जा में सजे दूल्हा और दुल्हन पैदल चल कर सड़क पार कर रहे थे । दुल्हन अपने दोनों हाथों से परियों जैसे सफ़ेद रेशमी परिधान को अपनी दोनों हथेलियों के चुटकी से उठाये हुए थी और दूल्हा पीछे से लम्बे फैले हुए सफ़ेद सर के ऊपर से उतरती हुई ओढ़नी और लहँगे के लरजते हुए घेरे को उठाये हुए था । उनके साथ दो जोड़ी दोस्त थे । संझाये सूर्य के प्रकाश में वह गौरी नवयौवना बाला का हल्का-सा मेकअप किया हुआ चेहरा और अधिक सुंदर लग रहा था । अपने प्रेम के राजकुमार का हाथ थामे हुए सड़क के जेब्रा लाइन पर चलते हुए दुल्हन के पाँव सड़क पर नहीं बल्कि गुलाब की सफ़ेद पंखुड़ियों पर पड़ रहे थे । धीरे से शीला की निगाह परियों वाले उस सफ़ेद ड्रेस से होती हुई उसके उदर पर पड़ी जो संभवतः आठ माह से अधिक के शिशु को गर्भ में लिए हुए अपने यार के विवाह के श्वेत रेशमी चमकदार परिधान में लुकाये हुए विश्वविजयी साम्राज्ञी की मुस्कान में सड़क पर चल रही थी । और यह दृश्य एम्सटर्डम जैसे रास्ते पर चल रहे व्यक्तियों के लिए कोई आश्चर्य नहीं रच रहा था । भीड़ के लिए दोनों का यह विशिष्ट रूप भी भीड़ का ही हिस्सा था । लेकिन जितने सुख से उसका प्रेमी अपनी विवाहिता बनने वाली गर्लफ्रेंड के सौंदर्य को निहार रहा था, बिल्कुल वैसे ही शीला भी उन दोनों को कार के शीशे के भीतर से देख रही थी । और उसे लगा कि बिल्कुल ऐसा ही दृश्य उस दिन होगा जब शीला का गोल्फ शिक्षक रोप अपनी गर्लफ्रेंड एना के साथ विवाह रचायेगा ।
शेखर अपने मित्र के साथ आदतन बातों में मशगूल थे । शीला ने चिकेन क्रोकेड को मस्टर्ड सॉस में डिप करते हुए मुँह में रखा । बीयर सिप करते हुए शेखर को हल्की निगाह से देखा वे अपने डिस्कशन में गंभीर थे । लगता है बिजनेस से संबंधित कोई बातचीत पक रही थी ।
फिर से शीला अपनी यादों में खो गयी । पिछले साल ही हेम्स्केरक इलाके के एक मशहूर किले में अपने विवाह और भव्य रिसेप्शन के बाद वह हनीमून के लिए शेखर के साथ वेनिश गयी थी । चर्च के सामने प्रसिद्ध सन्त मार्को स्क्वैयर पर ही चर्च की ओर से नवविवाहित सजा-धजा जोड़ा निकलते देखा । पच्चीस वर्ष के आस-पास का दूल्हा अपने काले सूट में परियों-सी सफ़ेद परिधान में बीस वर्ष के आस-पास की दुल्हन के साथ सिटी हॉल से 'रिंग-सिरेमनी' करके वेनिस के विश्व प्रसिद्ध मार्को स्क्वैयर पर आये, जहाँ प्रेम पाती पहुँचाने वाले और प्रेम युगल कपोतों के जोड़े के जोड़े जत्थों में मँडरा रहे थे । कभी लोग उनके पीछे भागते थे और कभी वे लोगों के पीछे उड़ते थे । खूबसूरत सनी-डे था । उजाला बरस रहा था । विश्व भर के पर्यटकों से वह परकोटा भरा हुआ था । किसी को अपनी परछाईं देखने की जगह नहीं थी । उस आयताकार खुले मैदान के चारों तरफ महँगी विश्व प्रसिद्ध यूरोपीय सामानों की ब्रैंड नेम दुकानें और टेरस, रेस्तराँ थे । वे शीला के बैठने वाले रेस्तराँ की ओर बढ़कर आये । संयोग से प्यानो म्यूजिक और सिंगर अपनी-अपनी रौ में थे । सौभाग्य से वे दोनों भी वहीं बैठे । वेटर के आने पर चाय का ऑर्डर दिया । वह नवविवाहित जोड़ा अपने विवाह का जश्न अकेले ही आनंद से मना रहा था । शीला की आँखों के सामने पहला ऐसा अनोखा विवाह और उसका उत्सव था । दो पीस कुकीज के साथ उन दोनों के लिए एक पॉट चाय आई । अपनी-अपनी कुकीज उन दोनों ने एक-दूसरे को बहुत प्यार की मुस्कराहट के साथ खिलाई । चाय पी । फिर अपनी खुशी के लिए एक-दूसरे को अपनी-अपनी बाँहों में लेकर और फैली हुई बाँहों में अपनी आँखों से प्रेम-पसार कर बजते हुए म्यूजिक पर थिरकते हुए नृत्य किया । पाँव थिरक रहे थे । बाँहें बाँहों में भिंची थीं । मुस्कराहट एक-दूसरे की मुस्कराहट में बँधी-सजी थी और आँखें एक-दूसरे के प्रेम में डूबी हुईं थीं । उनके लिए पृथ्वी उस क्षण स्वर्ग का कोना थी । देखने वालों की भीड़ लग गयी और जैम गयी । लोगों ने परमीशन ले-लेकर उन दोनों की तस्वीरें बनाईं । वे अकेले विवाह करके निकले । अकेले ही अपनी खुशियाँ मना रहे थे पर उनकी खुशियाँ सबके कैमरे में नेगेटिव से पॉजिटिव होकर बस गयी थीं । उन दोनों ने उस दिन वहाँ प्रेम के सुख का संसार रच दिया था । जिन भी आँखों में झाँक कर शीला देखती थी उसे लगता था जैसे वे सब आँखें अपनी-अपनी मैरिज सेरेमनी की स्मृतियों के सपनों में खोई हैं । उन दोनों की आँखें भी एक-दूसरे के प्रेम-सरोवर में नहा रहीं थीं । आधा घंटा से अधिक एक-दूसरे की बाँह में झूमते हुए … नाचते हुए और रह-रह कर होठों को चूमते हुए जीने के बाद फिर अपनी जगह पर आ बैठे । चेहरे की श्वेताभा प्रेम के अंतरंग सुख से लालाभा में बदल चुकी थी । नृत्य करते हुए प्रेम के जिस उपवन से होकर वे दोनों लौटे थे … उसकी कोमलता और सुगंध दोनों ही उनके चेहरे से झाँक रही थीं । शीला ने भी उन दोनों की अनुमति से तस्वीरें लीं । वेटर आया । उसने बिल रखा । दूल्हे ने अपने पर्स से बीस यूरो निकाले । प्लेट पर रखे । अपनी विवाहिता प्रिया का हाथ थाम कर विजयी सिकंदर की तरह निकल पड़ा । प्रेम पर विजय किसी भी युद्ध-विजय से अधिक फलदायी अनुभव होती है । निर्धन होते हुए भी सब कुछ जीत लेने की अनुभूति होती है । सारी धरती अपनी लगती है । प्रेम … विवाह और जीवन के इस दृश्य को सब देख रहे थे और जब तक वे दिखते रहे, लोग उन दोनों को देखते ही रहे ।"  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें